बांके बिहारी जी(Banke Bihari) का अलौकिक भक्त डाकू गोवर्धन

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Banke Bihari Ji:एक बार राजिस्थान मैं भागवत की कथा हो रही थी वही एक चोर जो हर रोज़ चोरी किया करता था एक दिन कथा मैं आकर बैठ गया और भागवत कथा सुनने लगा।छोटी-छोटी चोरी उसका रोज़ का काम था वह उतनी ही चोरी करता था कि उसका दो दिन के भोजन पानी की ब्यवस्था हो जाये । जब चोर कथा पंडाल मैं पंहुचा तो उस समय व्यास पीठ से व्यास जी बिहारी जी की चर्चा कर रहे थे। और बता रहे थे कि वृन्दावन मैं एक सलोना सा बालक रहता है जिसके हाथों मैं सुन्दर कंगन होते है। और जो सुन्दर -सुन्दर गले मैं हारों को धारण करता है, मुकुट धारण करता है , कौशुक मणि धारण करता है , प्रभु के सुन्दर रूप का वर्डन व्यास जो कर रहे थे। ये बात जब चोर ने सुनी कि वृन्दावन मैं कोई ऐसा बालक रहता है जो इतना सारा स्वर्ण पहनता है । चोर ने सोचा क्या रोज छोटी छोटी चोरी करता रहूँगा इससे अच्छा है इस बालक को लूट लिया जाये और वह व्यास जी के पास पंहुचा और पूछा के व्यास जी आप जो भी बोलते हो वो सब सच बोलते हो व्यास जी ने बोलै हाँ भाई हम तो जो कथा में बोलते है सब सच ही बोलते है । जो उसने पूछा ठीक फिर ये बताइये जिस बालक कि चर्चा अभी आप कर रहे थे वो कहा मिलेगा। व्यास जी बोले भैया उस बालक से मिलना है तो सीधे वृन्दावन चले जाओ वही मिलेगा वो ।

ये बात सुनते ही ये गोवर्धन नाम का डाकू वृन्दावन पहुंच गया और वहाँ लोगों से पूछने लगा के ये कृष्णा नाम का लड़का गाय चराने कहा जाता है । लोगो ने बताया अगर आपको गाय चराते कृष्णा से मिलना है तो सीथे ग्रिराज की तलहटी मैं चला जा वो तुम्हें वहीँ मिल जायेंगे । और वह चोर गिर्राज की तलहटी मैं पहुंचकर माखन मिश्री ले कर इंतज़ार करने लगा के वो छोटा सा बालक कब आएगा जिसने सुन्दर आभुषण धारण कर रखे है । कान्हा ने सोचा मेरे से मिलने कोई इतनी दूर से आया है और उससे मैंने दर्शन नहीं दिए तो बात बिगड़ जाएगी इसे तो दर्शन देने पड़ेंगे । और ठाकुर जी वही रूप धारण करके वही आभुषण पहन के पहुंच गए उस चोर के सामने । जब चोर ने ठाकुर जी को देखा तो माखन दिखाते हुए बोलै अरे बालक देख मैं तेरे लिए क्या लाया हूँ मैंने सुना है तुझे माखन मिश्री बहुत पसंद है ।

ये सुनते ही ठाकुर जी दौड़ कर उस डाकू के पास पहुंच गए और माखन मांगने लगे तो चोर बोलै मैं तुझे माखन दूंगा तो तू मुझे क्या देगा । ठाकुर जी बोले बाबा तुझे जो चाइये वो ले लिओ पहले माखन तो खिला और इस तरह उस चोर ने ठाकुर जी से एक एक कर सारे आभुषण उतार लिए । जब ठाकुर जी जाने लगे तो उस चोर को जाने क्या हुआ उसने ठाकुर जी को आवाज लगाई और बोला अरे बालक रुक तो सुन बिना कुण्डल के न तेरा चेहरा अच्छा नहीं लगता तो तू ये कुण्डल मेरी तरफ से रख ले और पहन ले और सब तो मेरा है । जब ठाकुर जी फिर से जाने लगे और जैसे हे मुड़े डाकू फिर से बोला अरे बालक रुक सुन बिना हार के तेरा गाला अच्छा नहीं लगता ये हार भी पहन ले । और वो हार भी उसने वापस कर दिया ठाकुर जी बोले ठीक है अब तो मैं जाऊं । डाकू बोला हाँ अब तू जा लेकिन ठाकुर जी जैसे हे मुड़े वो चोर फिर व्याकुल हो गया और फिर से बोला अरे बालक रुक बिना कंगन के तेरे हाथ फीके लग रहे है ये भी पहन ले और इस तरह से उसने जो जो सामान आभुषण ठाकुर से लिए था सब वापस उन्हें को पहना दिया ।

 

उसके बाद भी वो ब्याकुल होता रहा और बोला लाला मोये तो ऐसो लगे के अभी भी कछु अधुरों सो है लेकिन मेरे पास तो अब कछु न हैं लेकिन मैं तो चाहूँ के मेरे पास जो कछु भी है वो सब तेरे हे जाये । ठाकुर ने सोचा ऐसा भक्त मुझे कहा मिलेगा जो ये बोल दे के मेरे पास जो कुछ भी है वो मैं तुम्हे ही देना चाहूँ । अब तो इसके पास बस इसके प्राण बचे है और ऐसा ठाकुर जो ने मन मैं विचार किया के अब मैं अपने इस भक्त के प्राणो को हे स्वीकार कर लूँ और अपना मूल भूत रूप के दर्शन दे दिए जिस रूप के दर्शन के लिए कितने महात्मा संत परेशान रहते है । और जैसे हे ठाकुर जी ने अपना स्वरुप दिखया गोवर्धन डाकू ने ठाकुर जी के चरणों मैं गिर गया और प्रार्थना करने लगा हे नाथ ये प्रभु मुहे स्वीकार करो और उसी पल उसका शरीर वही छूट गया ।

आज भी अगर आप श्री ग्रिराज जी की तलहटी मैं जाओ तो वह गोवर्धन डाकू की समाधी का स्थान है। अब आप देखिये ठाकुर जी को पाना कितना आसान है अगर आप सहज है सरल है तो बिहारी जी को पाना कोई बड़ी बात नहीं है ।

बांके बिहारी का अर्थ

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