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सड़क विक्रेताओं की समस्या और समाधान(Street Vendors)

किसी रोड के किनारे किसी चाट वाले को देख कर आपने जरूर सोचा होगा कि यह दिन का कितना कमा लेता होगा या किसी सड़क किनारे पानीपुरी की रेडी लगाते हुए छोटे से लड़के को देखकर आप उत्सुक जरूर हुए होंगे कि ये हर मौसम में रोज एक ही समय पर कैसे आ जाता है। हम सब ने अपने अपने पैमानों से उन्हे नापा जरूर होगा लेकिन असल में कभी किसी ने यह नहीं सोचा कि यह सड़क विक्रेता असल में कितनी मुश्किलों से गुजरते हैं। कभी ग्राहक ना मिलना, कभी पुलिस के नखरे और कभी जालिम मौसम कभी उधारी की चिक-चिक कभी बड़े साहब की धमकी और न जाने कितनी रोज की नई मुसीबत इतनी आफत के बाद कुछ आमदनी हुई तो महंगाई की मार पड़ गई।

जागरूक नागरिक होने के नाते साहूकार की वजह पीएम सुनिधि के तहत 10,000 का लोन ले लिया लेकिन रोजगार फिर भी नहीं चला । उल्टा अवैध वसूली का विरोध करने पर डंडे खाएं और ब्याज भी देना पड़ रहा है। अब मुश्किल यह है की वसूली न देने पर सामान जब्त कर लिया जाता है तो क्या रोजगार और क्या आत्मनिर्भर भारत।यूं तो किसी को इन मुश्किलों की खबर नहीं मगर अखबार में किसी सड़क विक्रेता का इश्तेहार देख ले तो उसकी आमदनी का हिसाब पहले लगाने लगते हैं।

असल में हमें सड़क विक्रेताओं का समर्थन करना है ना कि उनकी मुसीबतें बढ़ानी है। ज्यादातर सड़क विक्रेता या तो अनपढ़ हैं या सिर्फ प्राइमरी शिक्षा प्राप्तरत है ऐसे में उचित कौशल की कमी की वजह से सड़क विक्रेता मुश्किल से अपना घर चला पाते हैं। स्ट्रीट वेंडर ऐक्ट 2014 (The Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act, 2014)के तहत वेंडर्स पर अधिकतम ₹500 का जुर्माना लगाया जा सकता है मगर आए दिन पुलिस स्वयं ही 1500 से 2000 तक का जुर्माना लगा रही है। इस अधिनियम के तहत जब तक वेडंर का सर्वे ना हो और वेंडिंग कमेटी व्यवस्थित ना हो तब तक किसी भी बेंडर को उसकी जगह से नहीं हटाया जा सकता ।

मगर प्रशासन ने स्वयं ही इस कानून को ताक पर रखा हुआ है। यह सड़क विक्रेता सिर्फ घर ही नहीं चलाते साथ ही देश की अर्थव्यवस्था में भी इनका अच्छा खासा सहयोग है। कोरोना काल के दौरान जब देश की अर्थव्यवस्था भंवर में फंसी हुई थी उस बीच सबसे बड़ा नुकसान भी सड़क विक्रेता(Street Vendors) को भी हुआ है। उनका रोजगार खत्म हो गयाए हजारों लोगों को दरबदर भटकना पड़ा। बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक महज 11 प्रतिशत  सड़क विक्रेता को ही प्रधानमंत्री क्रेडिट योजना का लाभ मिल पाया है। सड़क विक्रेता कई दिशाओं से भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कारगर साबित हो सकते है जैसे कम दामों पर अच्छी गुणवत्ता का सामान उपलब्ध कराना।

इकोनामी के साथ तालमेल बनाना कम सुविधाओं के साथ बेहतर सुविधा देने की वजह से ही सड़क विक्रेताओं का धंधा जैसे तैसे चल रहा है वही बड़े विक्रेता सही मेहनत और दिशा से आसमान भी छू रहे हैं । अगर इन विक्रेताओं को सही सहयोग व दिशा दी जाए तो इसमें कोई शक नहीं यह क्षेत्र ऊंचाइयां हासिल कर सकता है सिर्फ सरकार ही नहीं हम अपनी सीमाओं में रहकर भी इन लोगों की मदद कर सकते हैं जैसे:

  1. बड़े रेस्त्रां की बजाए छोटे सड़क विक्रेताओं से खाना लेना
  2. सड़क विक्रेताओं(Street Vendors) के बारे में सोशल मीडिया की मदद से जागरूकता फैलाकर मदद की जा सकती है
  3. अपने दोस्तों या रिश्तेदारों को अच्छे सड़क विक्रेताओं की अनुशंसा की जा सकती है

साथ ही सरकारी तंत्र भी कुछ उपायों से बेहतर मदद कर सकता है जैसे:

  1. सर्वे के साथ ही उन्हें सरकारी पहचान पत्र जारी करना।
  2. उचित प्रशिक्षण और कौशल विकास में सहायता करना।
  3. जन कल्याण योजनाओं में वरीयता देना ।

हालांकि भारत सरकार दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (डीएवाई-एनयूएलएम) एक केंद्र प्रायोजित योजना के एक घटक के रूप में “शहरी सड़क विक्रेताओं (एसयूएसवी) को सहायता” प्रदान कर रही है मगर यह समय की आवश्यकता है कि सरकार सड़क विक्रेताओं पर ध्यान दें और पुलिस की मनमानी लूट पर लगाम लगाएं।  सर्व समाज विकास की मानसिकता से ही आगे बढ़ सकता है। रोजगार का हक सबको मिलना चाहिए।आशा करते हैं कि भारत सरकार और जनता दोनों ही सड़क विक्रेताओं का महत्व समझ कर उन्हें प्रोत्साहन अवश्य देगी।

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