क्यों बढ़ रहे है बुजुर्गों में डिप्रेशन के केस (Depression in old age)

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The Agra News:हाल ही में WORLD POPULATION AGEING REPORT सामने आई है जिसमें बताया गया है कि 2050 तक भारत में बुजुर्गों की जनसंख्या कुल जनसंख्या का 20% रहेगा।उसी वजह से अब सब “A new vision for old age care पर जोर दे रहे हैं।पर क्या किसी ने बुजुर्गों की क्या स्थिति है हमारे भारतीय समाज में इसको जानने की कोशिश की है?

हम किसी के लिए तभी कुछ कर सकते हैं जब हमें उसकी परिस्थिति के बारे में पता होगा, वैसे ही हम बुजुर्गों के लिए तभी कुछ कर सकते हैं जब हम उनकी परिस्थिति को समझेंगे। सिर्फ दान करने से और अच्छी भावना रखना ही काफी नहीं है हमारे बुजुर्गों की जिंदगी को बेहतर करने के लिए। क्या हमने जानने की कोशिश की Depression in oldies  क्यों बढ़ता जा रहा है ।

लगातार भारत में वेस्टर्न कल्चर (western culture) हावी होता जा रहा है, जॉइंट फैमिली ( joint family) टूटकर छोटे परिवारों में तब्दील हो रही है, ऐसी स्थिति में बड़े शहरों में अब बुजुर्गों का ध्यान रखने के लिए आप तो प्रोफेशनल केयर टेकर ( professional caretaker) को रख दिया जाता है या फिर उन्हें old age home में रख दिया जाता है।पर क्या इतना करने से हमारी जिम्मेदारी हमारे बुजुर्गों के लिए खत्म हो जाती हैं।भारत में लगातार एनजीओ (NGO) के द्वारा चलाए जा रहे हैं ओल्ड एज होम (old age homes) की संख्या बढ़ती जा रही है पर यह old age homes बुजुर्गों को कैसे सुविधाएं दे रहा है इसकी पुख्ता जांच कौन करेगा?

Press information bureau ( PIB) में भारत सरकार ने बताया है कि सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय (Ministry of social justice and empowerment) के भीतर सरकार 551 एनजीओ (NGO) जो ओल्ड एज होम (old age homes) चलाती हैं उनका सपोर्ट करती है, पर सरकार के पास प्राइवेट (private) ओल्ड एज होम का कोई लेखा-जोखा मौजूद नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में यह पता लगाना नामुमकिन हो जाता है कि हमारी बुजुर्गों को प्राइवेट (private) ओल्ड एज होम में कैसे सुविधाएं मिल रही होंगी।

क्यों डिप्रेशन के साए में जा रहे हैं हमारे बुजुर्ग-What causes depression in seniors:

देखने – सुनने में असमर्थ (lack of vision and hearing) L.V Prasad Eye institution के द्वारा की गई एक study में पाया गया है कि जो बुजुर्ग देखने और सुनने में असमर्थ हैं उनमें डिप्रेशन की मात्रा 5 गुना है। इसमें यह भी बताया गया है कि 90% बुजुर्ग जो देखने में असमर्थ उनके लिए मामूली इलाज ही मुहैया ना तो उनके पास eye glasses लगाने की सुविधा है नहीं सर्जरी की।

जिम्मेदारी की भावना और बुनियादी ढांचे में कमी (Lack in sense of responsibility and in infrastructure):

घर हमारा अस्तित्व होता है पर दुखद बात यह है कि हमारा घर भी हमारे बुजुर्गों के हिसाब से नहीं बनाया गया है। हम सभी जानते हैं कि उम्र बढ़ने से हमारे शरीर की हड्डियां कमजोर होती है और हमारे बुजुर्गों का गिरने का हमेशा डर बना रहता है। बहुत से लोग इसी वजह से बुजुर्गों को एक कमरे में रख देते हैं और यह फरमान दे देते हैं कि आप इसी में रहिए, पर क्या हमने कभी उनको कमरे में कैद ना करके अपने घर को उनके हिसाब से डालने की कोशिश की, हम हर साल दिवाली पर घर की सफाई करते हैं, घर में कुछ नया करते हैं पर क्या हमने अपने बुजुर्गों को ध्यान में रखकर कुछ करवाया है।

स्वतंत्रता का खोना ( Loss of independence):

ऐसा हम शुरू से देखते आ रहे हैं कि जैसे जैसे लोग बुजुर्ग अवस्था में आते हैं उनके परिवार वाले उनको रोजमर्रा के काम से दूर कर देते हैं जैसे कि खाना बनाना हो, यह साफ सफाई करना हो। उनको अपने छोटे-छोटे कामों के लिए भी दूसरों पर आश्रित होना पड़ता है इन हालातों में उनके बुजुर्गों के अंदर मेंटल हेल्थ इंश्योरेंस (mental health issues) और डिप्रेशन (depression) और बढ़ भी जाता है।

सुविधाएं और पोषण की कमी ( lack of facilities and nutrients):

जब एक बच्चा बड़ा हो रहा होता है तो उसके मां-बाप हर चीज का ध्यान रखते हैं कि उसके लिए खाने के लिए क्या अच्छा होगा। उसके लिए कौन सी मोटर बाइक आएगी और वही दूसरी तरफ किसी के मां बाप बूढ़े हो रहे होते हैं तो कितनों को ध्यान होता है कि उनके लिए खाने में अब क्या बेहतर होगा उन से चला नहीं जाता अब उनके लिए व्हीलचेयर (wheelchair) की व्यवस्था भी करनी होगी।

कोरोना काल में कैसी रही बुजुर्गों की मनुष्स्थिति (mental health of elders during covid):

हम सभी पिछले 3 साल से कोरोना महामारी से जूझ रहे हैं कोरोना महामारी की शुरुआत से ही कहा जा रहा है कि करोना का असर बच्चों और बुजुर्गों सबसे ज्यादा है। कोरोना काल में हम सभी घर में बंधक के रूप में थे, बच्चों और बूढ़ों पर तो पाबंदियों का अंबार सा चल गया था। जिन बुजुर्गों के साथ उनके परिवार वाले थे उनकी स्थिति थोड़ी बेहतर भी थी पर जिन बुजुर्गों के साथ उनके परिवार का साया नहीं था, उनकी स्थिति करोना काल में दयनीय थी, वह अपनी दवाइयां के लिए, रोजमर्रा के सामानों के लिए बाहर भी नहीं निकल सकते थे। इस स्थिति में ज्यादातर बुजुर्ग अपने रिश्तेदारों या किसी अनजान व्यक्ति के सहारे रहते थे। 6 महीने तक सामाजिक दूरी की वजह से बहुत सारे बुजुर्गों में इनसाइट (anxiety) और फोबिया (phobia) के लक्षण पाए गए। AIIMS के द्वारा किए गए एक अध्ययन में जिसमें वहां इलाज करा रहे 106 बुजुर्ग शामिल थे यह पाया गया है कि, 18.87 फीसदी यानी 20 बुजुर्गों में डिप्रेशन के लक्षण पाए गए हैं। इनमें से 18 मरीजों में डिप्रेशन के हल्के लक्षण थे, जबकि 2 में मध्यम लक्षण थे। वहीं 24 बुजुर्गों यानी 22.6 फीसदी लोगों में दहशत के लक्षण देखे गए हैं. इनमें से 20 में घबराहट के हल्के लक्षण और 4 मरीजों में मध्यम लक्षण थे। अध्ययन में शामिल बुजुर्गों में से 92.45 प्रतिशत की देखभाल उनके अपने परिवार के सदस्यों ने की, जबकि 5.67 प्रतिशत अकेले रहते थे और 1.88 प्रतिशत वृद्धाश्रम में रहते थे। इनमें से 82.08 बुजुर्ग शहरी इलाकों में और 17.92 फीसदी बुजुर्ग ग्रामीण इलाकों में रह रहे थे।

हम कैसे कर सकते हैं अपने बुजुर्गों की मदद (how can we help our elders)

1.अच्छा वक्त बिताए उनके साथ (spend good time with them) बुढ़ापे में अकेलापन बहुत खाता है आप कोशिश कीजिए कि आप अपने बुजुर्गों के साथ बैठे हैं उनका हाल समाचार ले। उनके जिंदगी के अनुभव से अपनी जिंदगी को आप बेहतर बना सकते हैं।

2. साथ बैठकर खाना खाएं (have food together) हमारे भारतीय संस्कृति में साथ बैठकर खाने का हमेशा से रिवाज रहा है। साथ में बैठकर खाना खाने से ना सिर्फ हमारे बीच प्रेम भावना बढ़ती है बल्कि हम एक दूसरे के जीवन में क्या चल रहा है इससे भी अवगत रहते है।

3.इज्जत करें अपने बुजुर्गों की ( respect your elders) ऐसा कहा जाता है जो दूसरों को देते हैं वही हमें मिलता है अगर आज हम अपने बुजुर्गों की मेहनत की उनके प्यार की उनकी संस्कारों की इज्जत नहीं करेंगे तो कल हम भी उनकी जगह पर आएंगे और हमारे साथ भी वही होगा।

आगरा का ऐसा मंदिर है जहां लिखी है कुरान की आयतें और हनुमान चालीसा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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